जीवन की व्यस्तता और,
अशांत वातावरण से दूर,
कहीं जीवन के उस पार,
चलो मेरे मन अब फिर वहीं,
शून्यता के चिर परिचित राह पर।
समय चल चुका है अब तक,
अनन्त चालें अपनी,
कभी सुख तो कभी दुख,
बाँध रखी हैं इसने,
यहीं तक लक्ष्मण रेखा अपनी,
सुख-दुख का न हो,
नामो-निशां जहाँ मेरे दोस्त,
चलो मेरे मन अब फिर वही,
शून्यता के चिरपरिचित राह पर।
यह कैसी स्वतंत्रता है,
जहाँ चंद साँसों के लिए,
अपना ज़मीर गिरवी रखना पड़ता है,
कैसा है यह विखंडित भूखंड,
जिसे मजबूरी में हमें भी,
अपना वतन कहना पड़ता है,
लोक परलोक की कल्पना से परे,
चलो मेरे मन अब फिर वही,
शून्यता के चिरपरिचित राह पर।
जाति-धर्म जैसे असंख्य,
विद्वेषों से बहुत दूर,
जहाँ न हम अपमानित हों,
और न हमारा अस्तित्व विखंडित हो,
वास करता हो मानव जहाँ,
मानव का रूप धारण कर,
चलो मेरे मन अब फिर वहीं,
शून्यता के चिरपरिचित राह पर।
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Thursday, 19 March 2009
Saturday, 7 February 2009
जननायक की आंख़ों में आंसू
जननायक की आंख़ों में आंसू
दिनांक 24 जनवरी 2009, स्थल- एक सामाजिक न्याय की धारा को मजबूत करने वाले दल के मजबूत विधायक का आवास। लगन के दिनों मे यह आवास जनमासे की शक्ल ले लेता है और उन दिनों युं लगता है जैसे यह विस्तृत आवास एक महत्वपूर्ण विवाह केंद्र बन गया है। ख़ैर आज कोई लगन का दिन नहीं है फ़िर भी कनात लगे हैं और लोगों की भीड़ लगी है। झंडा ढोने वाले लोग हाथों में झंडा लेकर दल के प्रमुख़ नेता की जय-जयकार लगा रहे हैं। दल के पहरुये महंगी गाड़ियों से उतर रहे हैं और उनके पीछे उनके ध्वज वाहकों की भीड़ पहले तो दल के मुख़िया की जयकारा और बाद में जननायक अमर रहे का नारा बुलंद कर रहे हैं। बीच-बीच में पहरुओं का भी जयकारा सुनाई दे जाता है।
सड़क के दोनों तरफ़ बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि आज यहां उस व्यकित को याद किया जायेगा जिसने सामाजिक न्याय की धारा को बिहार में मज्बूत किया था। अपने महान पिता की याद में एक महान पुत्र जो सुशासन सरकार में जनता को सुचना देने वाले विभाग के मुख़िया हैं, का लिख़ा श्रद्धांजलि पत्र पटना से प्रकाशित होने वाले सभी प्रमुख़ समाचार पत्रों में छपा है। अब कारण चाहे जो भी हो उन्होंने अपने पिता को बड़ी शान से कई नेताओं का सम्मिश्रण बताया है। यदि जननायक आज जीवित होते तो अपने पुत्र के मेधा पर फ़ूले न समाते। ख़ैर अब लौटकर उसी स्थल पर पहुंचते हैं जहां जननायक को श्राद्धांजलि दी जा रही है।
दल के सुप्रीमो से लेकर आम कार्यकर्ता तक शामिल है इस विशेष सभा में। सांसद अपनी टिकट बचाने की आस लिये, विधायक अपनी सांसदगिरी सुनिश्चित करने की जुगत में और कार्यकर्ताओं के हाथों में कागज का ढड्ढर जिसमें स्वजनों के लिये नौकरी का आवेदन एवं ट्रांसफ़र का निवेदन शामिल है। सभी जमे हैं। सभी आने की आस देख़ रहे हैं।
बहरहाल दल के मुख़िया समेत कई प्रबुद्ध लोगों का आगमन हो चुका है, लोगो में नया जोश भर चुका है। लोग भागे चले जा रहे हैं अपने नेता की आगवानी के लिये। कोई बड़ा माला कोई छोटा माला लिये ख़ड़े हैं। जो कद-काठी से मजबूत हैं वे आगे तक जा पहुंचे है और जो मजबूर हैं वे पीछे ही ख़ड़े हैं।
श्राद्धांजलि कार्यक्रम की शुरुआत की जा रही है और लोग भाषण दे रहे हैं। कोई जननायक को याद कर रहा है तो कोई सुप्रीमो की महिमा का बख़ान कर रहा है और कोई अपने मन की भड़ास निकाल रहा है। सामने रख़ी तस्वीर में कर्पुरी जी गंभीरता से सोच रहे हैं। सामने पड़े एक फ़ूल पर कुछ बुंदे पड़ी हैं। मुझे अहसास हुआ ये ओस की बुंदें है मगर मेरे मन ने कहा ये जननायक की आंख़ों से गिरे हैं।
नवल किशोर कुमार
फ़ुलवारी शरीफ़, पटना
दिनांक 24 जनवरी 2009, स्थल- एक सामाजिक न्याय की धारा को मजबूत करने वाले दल के मजबूत विधायक का आवास। लगन के दिनों मे यह आवास जनमासे की शक्ल ले लेता है और उन दिनों युं लगता है जैसे यह विस्तृत आवास एक महत्वपूर्ण विवाह केंद्र बन गया है। ख़ैर आज कोई लगन का दिन नहीं है फ़िर भी कनात लगे हैं और लोगों की भीड़ लगी है। झंडा ढोने वाले लोग हाथों में झंडा लेकर दल के प्रमुख़ नेता की जय-जयकार लगा रहे हैं। दल के पहरुये महंगी गाड़ियों से उतर रहे हैं और उनके पीछे उनके ध्वज वाहकों की भीड़ पहले तो दल के मुख़िया की जयकारा और बाद में जननायक अमर रहे का नारा बुलंद कर रहे हैं। बीच-बीच में पहरुओं का भी जयकारा सुनाई दे जाता है।
सड़क के दोनों तरफ़ बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि आज यहां उस व्यकित को याद किया जायेगा जिसने सामाजिक न्याय की धारा को बिहार में मज्बूत किया था। अपने महान पिता की याद में एक महान पुत्र जो सुशासन सरकार में जनता को सुचना देने वाले विभाग के मुख़िया हैं, का लिख़ा श्रद्धांजलि पत्र पटना से प्रकाशित होने वाले सभी प्रमुख़ समाचार पत्रों में छपा है। अब कारण चाहे जो भी हो उन्होंने अपने पिता को बड़ी शान से कई नेताओं का सम्मिश्रण बताया है। यदि जननायक आज जीवित होते तो अपने पुत्र के मेधा पर फ़ूले न समाते। ख़ैर अब लौटकर उसी स्थल पर पहुंचते हैं जहां जननायक को श्राद्धांजलि दी जा रही है।
दल के सुप्रीमो से लेकर आम कार्यकर्ता तक शामिल है इस विशेष सभा में। सांसद अपनी टिकट बचाने की आस लिये, विधायक अपनी सांसदगिरी सुनिश्चित करने की जुगत में और कार्यकर्ताओं के हाथों में कागज का ढड्ढर जिसमें स्वजनों के लिये नौकरी का आवेदन एवं ट्रांसफ़र का निवेदन शामिल है। सभी जमे हैं। सभी आने की आस देख़ रहे हैं।
बहरहाल दल के मुख़िया समेत कई प्रबुद्ध लोगों का आगमन हो चुका है, लोगो में नया जोश भर चुका है। लोग भागे चले जा रहे हैं अपने नेता की आगवानी के लिये। कोई बड़ा माला कोई छोटा माला लिये ख़ड़े हैं। जो कद-काठी से मजबूत हैं वे आगे तक जा पहुंचे है और जो मजबूर हैं वे पीछे ही ख़ड़े हैं।
श्राद्धांजलि कार्यक्रम की शुरुआत की जा रही है और लोग भाषण दे रहे हैं। कोई जननायक को याद कर रहा है तो कोई सुप्रीमो की महिमा का बख़ान कर रहा है और कोई अपने मन की भड़ास निकाल रहा है। सामने रख़ी तस्वीर में कर्पुरी जी गंभीरता से सोच रहे हैं। सामने पड़े एक फ़ूल पर कुछ बुंदे पड़ी हैं। मुझे अहसास हुआ ये ओस की बुंदें है मगर मेरे मन ने कहा ये जननायक की आंख़ों से गिरे हैं।
नवल किशोर कुमार
फ़ुलवारी शरीफ़, पटना
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Monday, 19 January 2009
A letter for Mr. Nitish Kumar by nawal
सेवा में,
श्री नीतीश कुमार,
माननीय मुख़्यमंत्री,
बिहार
श्री नीतीश कुमार,
माननीय मुख़्यमंत्री,
बिहार
महाशय,
सर्वप्रथम बिहार में एक नयी पहल करने के लिये मेरी तरफ़ से धन्यवाद। यों तो आपके सुशासन ने बिहार को एक नयी पहचान दी है। पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तब दिल्ली वाले मुझसे कहते थे कि आप लालू के देश से आये हो, तो जाहिर है कि आप……। खैर अब मुझे ये सब नहीं सुनना पड़ता है।
आपकी दूरदृष्टि से बिहार की आंख़ों में एक नया स्वप्न जन्म ले रहा है। सम्भव है कि बिहार का यह सपना यथार्थ में परिवर्तित हो जाये। सड़कें चमक रही हैं, व्यापारियों के चेहरे चमक रहे हैं, वीआईपी नेताओं और अफ़सरों के चेहरे चमक रहे हैं, आपके मंत्रियों के चेहरे चमक रहे हैं और आप स्वयं भी सुर्य के समान चमक रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इस चमक से इन्कार नहीं करेंगे।
आपने लोकसभा चुनाव के पहले विकास यात्रा के सहारे लालू जी का रैली वाला फ़ार्मूला को बेकार साबित कर दिया है। पहले लालू जी रैली के द्वारा अपना शक्ति प्रदर्शन किया करते थे और आप विकास यात्रा कर। आकाशमार्ग से यात्रा कर और शाही दरबार का आयोजन कर आपने यह साबित कर दिया है कि आप लालू जी से कम नहीं हैं। जाति प्रेम के मामले में आप तो लालू जी से चालीस निकल गये। इस सफ़लता पर मेरी शुभकामनायें स्वीकार करें। आपका जिला प्रेम और जाति प्रेम दोनों अतुलनीय है। आप यात्रा में काफ़ी व्यस्त रह्ते हैं सो कुछ नाम मैं आपको स्मरण कराना चाहता हुं।

उपरोक्त नामों के अलावा सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जो आपका जाति प्रेम साबित करते हैं। अपनी जाति से उत्कट प्रेम बुरी बात नहीं है। परंतु हम भी आपकी जनता हैं। कुछ प्रश्न मेरे मानस पटल पर विचरण कर रहे हैं सो मेरी लेख़नी चाहती है कि उन्हे आपके समक्ष अवश्य प्रस्तुत करे।
(1) भुमिहार जाति से आपका इतना प्रेम क्यों है?
(2) आपने जिन सामंती शक्तियों का विरोध किया था,
सर्वप्रथम बिहार में एक नयी पहल करने के लिये मेरी तरफ़ से धन्यवाद। यों तो आपके सुशासन ने बिहार को एक नयी पहचान दी है। पहले जब मैं दिल्ली जाया करता था तब दिल्ली वाले मुझसे कहते थे कि आप लालू के देश से आये हो, तो जाहिर है कि आप……। खैर अब मुझे ये सब नहीं सुनना पड़ता है।
आपकी दूरदृष्टि से बिहार की आंख़ों में एक नया स्वप्न जन्म ले रहा है। सम्भव है कि बिहार का यह सपना यथार्थ में परिवर्तित हो जाये। सड़कें चमक रही हैं, व्यापारियों के चेहरे चमक रहे हैं, वीआईपी नेताओं और अफ़सरों के चेहरे चमक रहे हैं, आपके मंत्रियों के चेहरे चमक रहे हैं और आप स्वयं भी सुर्य के समान चमक रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इस चमक से इन्कार नहीं करेंगे।
आपने लोकसभा चुनाव के पहले विकास यात्रा के सहारे लालू जी का रैली वाला फ़ार्मूला को बेकार साबित कर दिया है। पहले लालू जी रैली के द्वारा अपना शक्ति प्रदर्शन किया करते थे और आप विकास यात्रा कर। आकाशमार्ग से यात्रा कर और शाही दरबार का आयोजन कर आपने यह साबित कर दिया है कि आप लालू जी से कम नहीं हैं। जाति प्रेम के मामले में आप तो लालू जी से चालीस निकल गये। इस सफ़लता पर मेरी शुभकामनायें स्वीकार करें। आपका जिला प्रेम और जाति प्रेम दोनों अतुलनीय है। आप यात्रा में काफ़ी व्यस्त रह्ते हैं सो कुछ नाम मैं आपको स्मरण कराना चाहता हुं।

उपरोक्त नामों के अलावा सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जो आपका जाति प्रेम साबित करते हैं। अपनी जाति से उत्कट प्रेम बुरी बात नहीं है। परंतु हम भी आपकी जनता हैं। कुछ प्रश्न मेरे मानस पटल पर विचरण कर रहे हैं सो मेरी लेख़नी चाहती है कि उन्हे आपके समक्ष अवश्य प्रस्तुत करे।
(1) भुमिहार जाति से आपका इतना प्रेम क्यों है?
(2) आपने जिन सामंती शक्तियों का विरोध किया था,
उनकी गोद में बैठ कर ओबीसी के साथ विश्वासघात क्यों किया?
आपकी यात्रा मंगलमय हो और सुख़दायक हो, इसीलिये बाकी बातें अगले पत्र में लिख़ुंगा। आशा है आप मुझे मेरी सत्यवादिता के लिये मुझे क्षमा करेंगे।
आपका विश्वासभाजन
नवल किशोर कुमार,
पटना, बिहार,
आपका विश्वासभाजन
नवल किशोर कुमार,
पटना, बिहार,
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