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Thursday, 19 March 2009

शून्यता के चिर परिचित राह पर।

जीवन की व्यस्तता और,
अशांत वातावरण से दूर,
कहीं जीवन के उस पार,
चलो मेरे मन अब फिर वहीं,
शून्यता के चिर परिचित राह पर।

समय चल चुका है अब तक,
अनन्त चालें अपनी,
कभी सुख तो कभी दुख,
बाँध रखी हैं इसने,
यहीं तक लक्ष्मण रेखा अपनी,
सुख-दुख का न हो,
नामो-निशां जहाँ मेरे दोस्त,
चलो मेरे मन अब फिर वही,
शून्यता के चिरपरिचित राह पर।

यह कैसी स्वतंत्रता है,
जहाँ चंद साँसों के लिए,
अपना ज़मीर गिरवी रखना पड़ता है,
कैसा है यह विखंडित भूखंड,
जिसे मजबूरी में हमें भी,
अपना वतन कहना पड़ता है,
लोक परलोक की कल्पना से परे,
चलो मेरे मन अब फिर वही,
शून्यता के चिरपरिचित राह पर।
जाति-धर्म जैसे असंख्य,

विद्वेषों से बहुत दूर,
जहाँ न हम अपमानित हों,
और न हमारा अस्तित्व विखंडित हो,
वास करता हो मानव जहाँ,
मानव का रूप धारण कर,
चलो मेरे मन अब फिर वहीं,
शून्यता के चिरपरिचित राह पर।

Friday, 29 August 2008

हर शब्द चीख़ता है

जब बिलख़-बिलख़ रोते हैं बच्चे,
बेचारी मातायें आंख़ों से नीर बहाती हैं,
अगाध पानी के बल पर जब,
नदियां जीवन को जीवन से दुर ले जाती हैं,
हर मनुष्य जीवन को तरसे,
हर सुहागिन कोसी को गुहराती हैं,
जल सिंधु की गरजती लहरें,
बेजान ठठरियों को दहलाती हैं,
चहुंओर मचता है तीव्र क्रंदन जब,
तब नेताओं के मुख़ पर रौनक आ जाती है।
दुर ख़ड़े पत्रकारों के कैमरे,
जब अख़बारों की शोभा बढाते हैं,
देख़ता हूं जब घोषणाओं का बाढ,
तब मेरी कविता का हर शब्द चीख़ता है।